माँ भारती के अमर सपूतो एक प्रण तुम इस बार करो!
दुष्ट शत्रु के सुर्ख लहू से दुर्गा चंडी का श्रृंगार करो!
त्रिशूल ब्रह्मोस अग्नि पृथ्वी को खड़ा एक कतार करो!
एक एक कर के दागो सबको, शत्रु पर बज्र प्रहार करो!
हिरण्यकश्यप का वध करने को फिर से नरसिंह अवतार धरो!
कालभैरव से विकराल वनों कोई विनय ना तुम स्वीकार करो!
माँ भारती का चीर हरण हुआ है,खून में तुम उबाल भरो!
शत्रु की छाती पर पांव धरो और चीर के टुकड़े चार करो!
इंक़लाब का नारा पुकारो,और तांडव की हुंकार भरो!
शत्रुचिता की भस्म रमाने को,शिवरात्रि का इंतज़ार करो!
माँ भारती के अमर सपूतो एक प्रण तुम इस बार करो !
दुष्ट शत्रु के सुर्ख लहू से दुर्गा चंडी का श्रृंगार करो।
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