Monday, 11 March 2019

दिलजले

ना जाने क्यूँ दिल जलाने की बात करते हो,
उदासी की बजह बन कर, फिर मुस्कुराने की बात करते हो!

आवारा परिंदो में शुमार हैं हम जिन के घर नहीं होते
खानाबदोशों की महफ़िल में आशियाने की बात करते हो!

वो भी क्या दिन थे जब ज़माने में वफ़ा की मिसाल थे हम,
अब इस मतलब के दौर में बीते ज़माने की  बात करते हो!

आलम तो ये है कि अपना साया देख सहम जाते हैं हम,
तुम पत्थरों के शहर में शीशे का घर बनाने की बात करते हो!

तेरे चाहने वालों की महफ़िल से वेबजह निकाले गए हैं हम,
नाम मेरा ले कर न जाने किस दीवाने की बात करते हो!

ना जाने क्यूँ दिल जलाने की बात करते हो,
उदासी की बजह बन कर, फिर मुस्कुराने की बात करते हो।

                -दीपक भरद्वाज

Thursday, 7 March 2019

शौक

वो तीरे-ए-नज़र चलाते हैं ,
हम चाक-ए-जिगर सीते हैं।
वो कातिलों में अब्बल हैं,
हम उन की सलामती को जीते हैं।
पीने का शौक तो हम दोनों का साँझा है, दोस्त
वस वो कांच के जाम से पीते हैं
और हम उन की आँख से पीते हैं।

                   -दीपक भारद्वाज

Wednesday, 6 March 2019

गुज़ारिश

इक तेरी आँखों का समंदर गहरा पसन्द है,
दूसरा तेरे चेहरे पे जुल्फों का पहरा पसन्द है,
जब भी मिलना मुझसे, तो नज़रें मिला के मिलना,
तेरी आँखों के आईने में मुझे खुद का चेहरा पसन्द है।

तेरी नज़र

तेरी नज़र का खुद पर असर लगता है!
और ये असर कुछ इस कदर लगता है!
कि कयामत का कोई ख़ौफ़ नहीं मुझे!
बस इक तेरी सादगी से डर लगता है।

आपका असर

बेनक़ाब होकर जो निकले हो घर से, न जाने क्या गुल खिलाओगे!
गरीबों की बस्ती से गुजरोगे सजकर, और बेचारों के घर जलाओगे!

मैख़ाने के साकी को पूछेगा कौन, जब आँखों से मुफ्त पिलाओगे!
बोतल के शिकारी पैमाने में निपटेंगे, जब नज़रों के ज़ाम छलकाओगे!

अदाओं के ख़ंजर हैं जान के दुश्मन, मासूमों के कत्ल करवाओगे!
दीवानों बेचारों का तो काम है मरना, चुन चुन के ठिकाने लगाओगे!

माना हो अदाओं की शोहरत के मालिक,क्या मुफ्त में सब कुछ लुटाओगे!
खुदा से आपकी शिकायत भी होगी, गर हरकत से वाज़ न आओगे!

बेनक़ाब होकर जो निकले हो घर से, न जाने क्या गुल खिलाओगे!
गरीबों की बस्ती से गुजरोगे सजकर, और बेचारों के घर जलाओगे।

Friday, 15 February 2019

आक्रोश

माँ भारती के अमर सपूतो एक प्रण तुम इस बार करो!
दुष्ट शत्रु के सुर्ख लहू से दुर्गा चंडी का श्रृंगार करो!

त्रिशूल ब्रह्मोस अग्नि पृथ्वी को खड़ा एक कतार करो!
एक एक कर के दागो सबको, शत्रु पर बज्र प्रहार करो!

हिरण्यकश्यप का वध करने को फिर से नरसिंह अवतार धरो!
कालभैरव से विकराल वनों कोई विनय ना तुम स्वीकार करो!

माँ भारती का चीर हरण हुआ है,खून में तुम उबाल भरो!
शत्रु की छाती पर पांव धरो और चीर के टुकड़े चार करो!

इंक़लाब का नारा पुकारो,और तांडव की हुंकार भरो!
शत्रुचिता की भस्म रमाने को,शिवरात्रि का इंतज़ार करो!

माँ भारती के अमर सपूतो एक प्रण तुम इस बार करो !
दुष्ट शत्रु के सुर्ख लहू से दुर्गा चंडी का श्रृंगार करो।

Thursday, 14 February 2019

इतनी नफरत क्यों

बारूद से जलते जिस्म के हिस्से पानी से भिगो रहा है!
सड़कों पर बिखरे खून के धब्बे आंसुओं से धो रहा है!
ये बादल यूँ हीं बेवजह नहीं बरस रहे, ज़रा गौर करना!
उन महान शहीदों के बलिदान पर वो खुदा भी रो रहा है।