बेनक़ाब होकर जो निकले हो घर से, न जाने क्या गुल खिलाओगे!
गरीबों की बस्ती से गुजरोगे सजकर, और बेचारों के घर जलाओगे!
मैख़ाने के साकी को पूछेगा कौन, जब आँखों से मुफ्त पिलाओगे!
बोतल के शिकारी पैमाने में निपटेंगे, जब नज़रों के ज़ाम छलकाओगे!
अदाओं के ख़ंजर हैं जान के दुश्मन, मासूमों के कत्ल करवाओगे!
दीवानों बेचारों का तो काम है मरना, चुन चुन के ठिकाने लगाओगे!
माना हो अदाओं की शोहरत के मालिक,क्या मुफ्त में सब कुछ लुटाओगे!
खुदा से आपकी शिकायत भी होगी, गर हरकत से वाज़ न आओगे!
बेनक़ाब होकर जो निकले हो घर से, न जाने क्या गुल खिलाओगे!
गरीबों की बस्ती से गुजरोगे सजकर, और बेचारों के घर जलाओगे।
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