बांधे थे जो मजार के पीपल से वफ़ा के धागे, आज वो खोल आया हूं मैं! बैठा है जो पत्थर बन कर उसके नीचे ,चार बातें उसे भी बोल आया हूं मैं! अपनी खुदाई की तो फ़िक्र करता है, मेरी तन्हाई की नहीं! इन्साफ के तराजु में आज उसे भी तोल आया हूं मैं।
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