Monday, 11 March 2019

दिलजले

ना जाने क्यूँ दिल जलाने की बात करते हो,
उदासी की बजह बन कर, फिर मुस्कुराने की बात करते हो!

आवारा परिंदो में शुमार हैं हम जिन के घर नहीं होते
खानाबदोशों की महफ़िल में आशियाने की बात करते हो!

वो भी क्या दिन थे जब ज़माने में वफ़ा की मिसाल थे हम,
अब इस मतलब के दौर में बीते ज़माने की  बात करते हो!

आलम तो ये है कि अपना साया देख सहम जाते हैं हम,
तुम पत्थरों के शहर में शीशे का घर बनाने की बात करते हो!

तेरे चाहने वालों की महफ़िल से वेबजह निकाले गए हैं हम,
नाम मेरा ले कर न जाने किस दीवाने की बात करते हो!

ना जाने क्यूँ दिल जलाने की बात करते हो,
उदासी की बजह बन कर, फिर मुस्कुराने की बात करते हो।

                -दीपक भरद्वाज

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